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Durgesh Kumar


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मोदी को लाना है ……

Posted On: 1 Apr, 2014  
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social issues पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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HAPPY TEACHER’S DAY … WE MISS YOU ANUJ SIR ….!!

Posted On: 5 Sep, 2013  
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Special Days में

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आखिरी ख्वाइस….. फ़ूड सिक्यूरिटी बिल स्कैम..!१!

Posted On: 3 Sep, 2013  
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आखिरकार हमारे प्रधान मंत्री को गुस्सा आ गया …..

Posted On: 30 Aug, 2013  
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Hello world!

Posted On: 30 Aug, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

हिंदी और हिंदुस्तान किसी भी देश का दिल उसकी किसी भी देश की धड़कन उस देश की भाषा के माध्यम से धडकती हुई सुने देती है. हिंदी भारत की धड़कन है. १४ सितम्बर का दिन देश में हिंदी प्रेमियों के लिए विशेष महत्त्व रखता है. यह वही दिन है जब देश के संविधान निर्माताओं ने हिंदी को देश की राजभाषा के रूप में स्वीकृत किया गया और संविधान के अनुच्छेद ३४३ के अनुसार हिंदी को देश की राजभाषा के पद पर आरूढ़ कर दिया परन्तु देखते ही देखते हिंदी विरोधी स्वर उभरने लगे और हिंदी के विरोध ने उग्र आन्दोलन का रूप ले लिया. देश के स्वाधीनता संग्राम का शंखनाद जिस भाषा में किया गया देश के स्वाधीन होते ही वह भाषा देश में ही अस्वीकार्य हो गई. जिसका सीधा असर आज तक देखने को मिल रहा है. यहाँ यह बताने की आवश्यकता नही कि १९४७ से लेकर १९६३ और बाद में १९७३ के राजभाषा अधिनियमों में हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भी भारत की राजभाषा के पद पर आसीन हो गई और आज तक वही स्थिति बनी हुई है. हिंदी का विरोध करते हुए जब संसद में हिंदी विरोधी खेमे ने तात्कालिक प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से जवाब माँगा तो नेहरु जी स्पष्ट रूप से संसद में कहा की जब तक एक भी राज्य हिंदी को राजभाषा बनाने का विरोध करता है तब तक में हिंदी को राजभाषा घोषित नहीं करूंगा. और आज स्थिति यह है कि तमिलनाडु और नागालैंड के अतिरिक्त देश के लगभग सभी राज्य इस बात के लिय राजी हैं कि हिंदी ही देश की राजभाषा होनी चाहिए. परन्तु आज हमारे समक्ष एक विकट प्रश्न यह है की हिंदी का स्वरुप क्या है? हिंदी वास्तव में एक भाषा नही है अपितु यस देश की कई भाषाओँ का समूह है. इसमें देश के हर कोने की भाषा सम्मिलित हो चुकी है. हिंदी के प्रारम्भिक रूप अपभ्रंश में ही प्राप्त होने लगता है इसीलिए हिंदी का आविर्भाव आज से लगभग ११०० वर्ष पूर्व माना जा सकता है. अमीर खुसरों ने हिंदी का एक न्य रूप हमारे सामने रहा था जिसे हम खड़ीबोली कहते है. और खुसरो की इसी खड़ीबोली ने आज की आधुनिक हिंदी का रूप धारण कर लिया परन्तु आज की हिंदी की एक मुख्या विशेषता यह है कि इसमें बृज मंडल की बृज भाषा भी है और अवधी भाषा भी. राजस्थानी हिंदी भी है तो हरयाणवी भी. मेवाती भी है तो मेवाड़ी भी. पहाड़ी हिंदी भी है तो भोजपुरी भी आज हिंदी का ही एक रूप हमारे सम्मुख है. इन सभी भाषाओँ का सम्मिलित रूप ही वास्तव में हिंदी है. परन्तु आज हम देखते हैं हिंदी के अधिकतर विद्वान स्वयं हिंदी को लोकभाषा के रूप में स्वीकार कराना नही चाहते हैं. हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बना कर वे इसे क्लिष्टता प्रदान करते जा रहे है. कोई भी भाषा लोकभाषा के पद पर तभी तक आसीन रहती है जब तक वह आम लोगों की भाषा बनी रहे और साहित्य सृजन भी उसी लोकतत्व को ध्यान में रख कर किया जाए यही कारण है कि हिंदी के लोकप्रिय लेखक उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी को सबने सर माथे बैठा लिया, राष्ट्रीय कवि मैथिलीशरण गुप्त जी की “भारत भारती” की स्वाधीनता सग्राम के समय घर घर पूजा की जाने लगी थी. जयशंकर प्रसाद जी की “कामायनी” का दीवाना कौन नही है? परन्तु खेद का विषय है कि जिस हिंदी को इन हिंदी विद्वानों ने शिखर तक पहुंचाया वही हिंदी आज का हिंदी प्रेमी कठिन से कठिनतर बनाता जा रहा है. भाषा सरल से सरलतर होनी चाहिए. सरलता ही मनुष्य की पहली पसंद है कठिन विषयों या भाषाओँ की और लोग देखते भी नही. लेकिन इसका मतलब यह नही कि की हम हिंदी से साहित्यिकता निकाल दें. साहित्यिकता किसी भी भाषा का सर्वोत्तम रूप होता है यह गुण हर एक भाषा अपने अन्दर अपनाना चाहती है हिंदी ने भी अपनाया परन्तु यह साहित्यिकता का पुट प्रेमचंद और मैथिलीशरण गुप्त के जैसा होना चाहिए. एक और दीगर बात है की हम यह भी देखें कि क्या हिंदी ही हमारी आज की सबसे बड़ी जरुरत है? यह सही है कि देश की अपनी कोई एक भाषा होनी ही चाहिए और वह हिंदी ही हो सकती है क्योंकि देश के अधिकांश राज्य इसे स्वीकार कर ही चुके हैं लेकिन अंग्रेजी भी आज हमारे लिए उतनी ही आवश्यक है जितनी कि हिंदी. हिंदी हमारा स्वाभिमान है और अंग्रेजी हमारी जरुरत. अंग्रेजी के अभाव हम काफी पिछड़ सकते है. आप स्वयं देखें की स्वाधीनता के तुरंत बाद जिन जिन राज्यों ने हिंदी भाषा को अपनाया वे वे राज्य आज अत्यंत गरीबी और पिछड़ेपन में जी रहे हैं और इसके विपरीत जिन जिन राज्यों ने हिंदी के स्थान पर अग्रेजी को अपनाया वे आज काफी आगे निकल चुके है उत्तरप्रदेश और बिहार का पिछड़ापन तथा दक्षिण भारतीय राज्यों का विकास हमारे सम्मुख हैं. इसलिए हमें अपने स्वाभिमान को महत्त्व देते हुए हिंदी को राजभाषा के पद पर आसीन करवाना चाहिए और इसके लिए जरुरत है तो केवल इच्छाशक्ति की कि हम अपने संविधान में एक छोटा स संशोधन करे कि देश की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी है लेकिन साथ ही हमें यह भी याद रखना ही होगा कि अंग्रेजी आज हमारी जरुरत बन चुकी है जैसे घर में माँ और बहु दोनों होती है, दोनों का महत्त्व होता है और दोनों की ही जरुरत होती है.

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